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मेरी अनसुलझी कविताएँ

कुछ यक्ष प्रश्न है मेरे
संवाद अधूरा है हमारे दरमिया
जो मिल गया वो अपूर्ण है
जो प्राप्त नही उसकी चाह है
शून्य है ब्रह्मांड यह
तो किसकी खोज में मानव है
वो ईश्वर तो निराकार है
अगम्य है अपरम्पार है
यहाँ स्वयं कुछ तेरा नही
जो मिल गया वो छिन गया
हर दिन खोज होती हैं
नया हर रोज मिलता है
कुछ पाया  नया
कुछ मिला नवीन
पर फिर भी ये जीवन है तो तेरा नही
जिसकी खोज में तू चल रहा
वह भी तेरा नही
अश्रु किस बात के
खुशियों का भी कोई घर नही
यह बोझ ढोती साँसो का
श्मशान तक का साथ है
आवागमन का चक्र है
न मैं तेरे साथ हूँ
न तू मेरे साथ है

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